काशी सत्संग : समय अनमोल

एक छात्र उच्च शिक्षा के लिए परदेश गया। उसका छात्रावास महाविद्यालय से थोड़ी ही दूर था। विद्यालय का समय प्रातः 8 बजे का था। पहले दिन जब वह छात्र अपने कमरे में तैयार हो रहा था, तभी आठ बज गए। फिर भी, वह आराम से चलता हुआ विद्यालय पहुंचा। वहां उसने देखा कि सब छात्र कक्षा में आ चुके है और पढ़ाई प्रारम्भ हो चुकी है। शिक्षक ने उस छात्र को कक्षा में बैठने की अनुमति तो दे दी, लेकिन कहा,”मिस्टर, आप समय पर नहीं आते!”
अगले दिन ने समय पर कक्षा में पहुंचने का प्रयास किया, परंतु वह पांच मिनट देर से पहुंचा। शिक्षक ने पुन कहा “मिस्टर, आप समय पर नहीं आते!”
दो बार कक्षा में सबके सामने टोकने से छात्र लज्जित हुआ। उसने देखा कि उसके अतिरिक्त और कोई छात्र देर से नहीं आता। अतः तीसरे दिन उसने विशेष प्रयास किया और पंद्रह मिनट पहले ही विद्यालय पहुंच गया। उसने देखा कि द्वार बंद है और वहां एक भी छात्र या शिक्षक नहीं है। जब आठ बजने में चार-पांच मिनट रह गए, तब चपरासी आया और उसने द्वार खोला। दरवाजा खोलने के पश्चात दो-तीन मिनट में ही सारे छात्र और शिक्षक आ गए। ठीक आठ बजे घंटा बजा और पढ़ाई आरम्भ हुई। एक भी छात्र देर से नहीं आया।
छात्र प्रसन्न था कि आज वह देर से नहीं,समय पर कक्षा में आया है, परंतु उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब शिक्षक ने फिर उसको टोका, कहा, ‘आप समय का ध्यान नहीं रखते।’
छात्र के आश्चर्य की सीमा नहीं रही, उसने विनम्रतापूर्वक पूछा, ‘सर,आज मैं देर से नहीं आया,बल्कि 15 मिनट पहले ही आ गया था। फिर भी आप ऐसा कह रहे है!’
इस पर शिक्षक ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘ दो- चार मिनट भी देर से आना ठीक नहीं है, लेकिन 15 मिनट पहले आकर फाटक के बाहर खड़े रहना भी अच्छा नहीं है। इन मिनटों में आप अपने कमरे में कुछ अध्ययन कर सकते थे।’ इस तरह अध्यापक ने छात्र को समय के महत्व का ज्ञान कराया।
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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