काशी सत्संग: राजा का स्वर्ग दर्शन

एक राजा अपने दरबारियों से पौराणिक आख्यान सुना करता था। एक मंत्री ने राजा को इंद्र और उनके स्वर्ग की कथा सुनाई। राजा ने कहा- मंत्रीजी! स्वर्ग की बात मुझे तो गप लगती है। मंत्री बोला- महाराज! स्वर्ग तो वास्तव में होता है।
यह सुनकर राजा ने कहा- यदि ऐसा है, तो आप हम सभी को इंद्र की सवारी के दर्शन कराइए। मंत्री को राजा के इस आग्रह ने बड़ी परेशानी में डाल दिया। दिन बीतने लगे। इसी बीच राजा ने राजधानी की नदी पर बांध का निर्माण कार्य शुरू कराया, जिसकी देख-रेख का काम मंत्री को सौंपा गया। जब बांध बन गया, तो मंत्री ने उसके पास एक दीवार बनवाकर उसमें छोटे-छोटे सरोवर बनवाए।
सुंदर नक्काशी से दीवार व झरोखे सुशोभित हो उठे। शरद पूर्णिमा की रात मंत्री राजा व अन्य दरबारियों को लेकर नदी पर गया और सभी को झरोखों में बैठाकर कहा- अभी आप सभी को यहां इंद्र की सवारी आती दिखाई देगी। फिर मंत्री ने जोर-जोर से बोलना शुरू किया- देखिए महाराज! इंद्र की सवारी आ रही है। ऐरावत पर इंद्र, साथ में सुंदर अप्सराएं। वाह! किंतु पुण्यशाली लोगों को ही यह दिखाई देगा, पापी को नहीं। किसी को कुछ नहीं दिखाई दिया, किंतु फिर भी सभी चुप बैठे रहे। अगले दिन राजा ने मंत्री से वास्तविकता जाननी चाही, तो वह बोला- महाराज! आपने बांध बनवाया है। इससे गरीबों को बड़ा सुख मिला है। उनके सुख में ही आपका स्वर्ग छिपा है। राजा समझ गया कि अपने सत्कर्मों की सुवास धरती पर ही स्वर्ग के दर्शन करा देती है।
सार यह कि यदि हम दूसरों के चेहरों पर तनिक भी खुशी ला सकें, उनके जीवन का एक कोना भी हरा-भरा कर सकें, बस वहीं स्वर्ग मिल जाता है।
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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