काशी सत्संग: त्याग का सम्मान

एक था कंजूस सेठ । इतना कंजूस कि अपने-आप पर एक धेला भी खर्च नहीं करता था। लाखों का स्वामी था, फिर भी फटे कपड़े पहने रहता। केवल एक अच्छी बात थी उसमें कि वह सत्संग में जाता था। वहाँ भी उसे कोई नहीं पूछता था। सबसे अंत में जूतों के पास बैठ जाता और कथा सुनता रहता।
आखिर कथा के भोग पड़ने का दिन आया, तो सब लोग भेंट चढ़ाने कोई-न-कोई वस्तु लाए। कंजूस सेठ भी एक मैले-से रुमाल में कुछ लाया। सब लोग अपनी लाई वस्तु रखते गए। सेठ भी आगे बढ़ा। अपना रुमाल खोल दिया उसने। उसमें से निकले- अशर्फियाँ, पौंड और सोना। उन्हें पंडित जी के सामने उड़ेलकर वह जाने लगा।
पंडित जी ने कहा – नहीं-नहीं सेठ जी ! वहाँ नहीं, यहाँ मेरे पास बैठिए।
सेठ जी ने बैठते हुए कहा – ” यह तो अशर्फियों और सोने का सम्मान है पंडित जी, मेरा सम्मान तो नहीं ? “
पंडित जी बोले – ” आप भूलते हैं सेठ जी ! धन तो पहले भी आपके पास था। यह आपके धन का सम्मान नहीं, धन के त्याग का सम्मान है।”
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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