काशी सत्संग : विनय

एक चांडाल की पत्नी को गर्भावस्था के दौरान एक दिन उसे आम खाने की इच्छा हुई, पर आम के फल का मौसम बीत चुका था। उसे जानकारी हुई कि राजा के बाग में बारह महीने आम आते रहते है, परंतु पहरेदारों के कारण लाने की परेशानी थी।
चांडाल को दो विद्यायें आती थी। एक विद्या से डाली झुक जाती थी, दूसरी से डाली ऊपर हो जाती थी। उनके प्रयोग से वह बाहर से ही आम तोड़ लेता था। पहरेदार ने राजा से शिकायत की कि आम के चोर का पता नहीं लग रहा है। आम कम होते जा रहे है, तो उन्होंने अपने पुत्र अभय कुमार को चोर पकड़ने के लिए नियुक्त किया। चोर पकड़ा गया। उसने आम तोड़ने की बात स्वीकार की, तो राजकुमार ने पूछा, ‘यह तुम कैसे करते हो?’ तब चांडाल न3 अपनी दो विद्याओं के बारे में बतलाया।
चांडाल को राजा के सामने पेश किया, तो राजा ने कहा, ‘यदि यह दोनों विद्यायें मुझे बतला दोगे, तो मैं तुम्हें फांसी की सजा नहीं दूंगा।’ चांडाल ने विद्या सिखाने के लिए सहमति प्रगट कर दी। राजा कुर्सी पर बैठकर चांडाल से जो नीचे बैठा था सीखने लगा। परंतु राजा विद्या नही सीख पाया।
मंत्री ने राजा को सलाह दी कि किसी विद्या को सिखाने वाले गुरु का स्थान ऊंचा होता है, इसलिए आप गुरु(चांडाल) को राजगद्दी पर बैठाएं। राजा ने विनयपूर्वक गुरु का स्थान चांडाल को दिया और विद्या सिखाने का निवेदन किया। ऐसा करते ही राजा को विद्या प्राप्त हो गई। मित्रों, इसी लिए ज्ञानियों ने कहा है कि नम्रता में विचित्र शक्ति होती है औऱ विनय के बिना विद्या प्राप्त नहीं होती है।
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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