काशी सत्संग: आधी भरी गगरी

एक बुजुर्ग ग्रामीण के पास एक बहुत ही सुंदर और शक्तिशाली घोड़ा था। वह उससे बहुत प्यार करता था। उस घोड़े को खरीदने के कई आकर्षक प्रस्ताव उसके पास आए, मगर उसने उसे नहीं बेचा।
एक रात उसका घोड़ा अस्तबल से गायब हो गया। गांव वालों में से किसी ने कहा, “अच्छा होता कि तुम इसे किसी को बेच देते। कई तो बड़ी कीमत दे रहे थे। बड़ा नुकसान हो गया। ”
परंतु उस बुजुर्ग ने यह बात ठहाके में उड़ा दी और कहा– “आप सब बकवास कर रहे हैं। मेरे लिए तो मेरा घोड़ा बस अस्तबल में नहीं है। ईश्वर की इच्छा में जो होगा आगे देखा जाएगा।”
कुछ दिन बाद उसका घोड़ा अस्तबल में वापस आ गया। वो अपने साथ कई जंगली घोड़े व घोड़ियां ले आया था। ग्रामीणों ने उसे बधाईयां दी और कहा कि उसका तो भाग्य चमक गया है।
परंतु उस बुजुर्ग ने फिर से यह बात ठहाके में उड़ा दी और कहा– “मेरे लिए तो बस आज मेरा घोड़ा वापस आया है। कल क्या होगा किसने देखा है।”
अगले दिन उस बुजुर्ग का बेटा एक जंगली घोड़े की सवारी करते गिर पड़ा और उसकी टांग टूट गई। लोगों ने बुजुर्ग से सहानुभूति दर्शाई और कहा कि इससे तो बेहतर होता कि घोड़ा वापस ही नहीं आता। न वो वापस आता और न ही ये दुर्घटना घटती।
बुजुर्ग ने कहा– “किसी को इसका निष्कर्ष निकालने की जरूरत नहीं है। मेरे पुत्र के साथ एक हादसा हुआ है, ऐसा किसी के साथ भी हो सकता है, बस!”
कुछ दिनों के बाद राजा के सिपाही गांव आए, और गांव के तमाम जवान आदमियों को अपने साथ लेकर चले गए। राजा को पड़ोसी देश में युद्ध करना था, और इसलिए नए सिपाहियों की भरती जरूरी थी। उस बुजुर्ग का बेटा चूंकि घायल था और युद्ध में किसी काम का नहीं था, अतः उसे नहीं ले जाया गया।
गांव के बड़े बुजुर्गों ने उस बुजुर्ग से कहा – “हमने तो हमारे पुत्रों को खो दिया। दुश्मन तो ताकतवर है। युद्ध में हार निश्चित है। तुम भाग्यशाली हो, कम से कम तुम्हारा पुत्र तुम्हारे साथ तो है।”
उस बुजुर्ग ने कहा– “अभिशाप या आशीर्वाद के बीच बस आपकी निगाह का फर्क होता है, इसीलिए किसी भी चीज को वैसी निगाहों से न देखें। समभाव से यदि चीजों को होने देंगे तो दुनिया खूबसूरत लगेगी।”
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *