काशी सत्संग: दाता एक राम

एक बार लक्ष्मीजी श्रीहरि को भोजन करा रही थीं। भगवान विष्णु ने पहला ग्रास मुंह में लेने से पहले ही हाथ रोक लिया और उठकर चले गए। कुछ देर बाद लौटकर आए और भोजन किया। इस पर लक्ष्मीजी ने भगवान से भोजन के बीच में उठकर जाने का कारण पूछा। श्रीहरि ने बड़े प्रेम से कहा, “मेरे चार भक्त भूखे थे, उन्हें खिलाकर आया हूं।”
लक्ष्मीजी को थोड़ा अजीब सा लगा। उनके मन में श्रीहरि की परीक्षा लेने का विचार आया। उन्होंने दूसरे दिन एक छोटी डिबिया में पांच चींटियों को बंद कर दिया। उसके कुछ देर बाद उन्होंने भगवान के लिए भोजन परोसा। प्रभु ने खूब मन से भोजन ग्रहण किया। आखिर में लक्ष्मीजी बोलीं, “प्रभु! आज आपके पांच भक्त भूखे हैं और आपने भोजन ग्रहण कर लिया?”
प्रभु ने कहा-ऐसा हो ही नहीं सकता, तो लक्ष्मीजी मुस्करा पड़ीं और पूरे आत्मविश्वास से भगवान को चीटियों वाली डिब्बी खोलकर दिखाई। डिब्बी देखकर श्रीहरि मुस्करा उठे। यह देख देवी लक्ष्मी हतप्रभ रह गई कि डिब्बी में बंद चींटियों के मुंह में चावल के कण थे। लक्ष्मीजी ने पूछा- बंद डिबिया में चावल कैसे आए, प्रभु यह आपने कब डाले?
श्रीहरि ने सुंदर जबाब दिया- देवी आपने चिटियों को डिब्बी में बंद करते समय जब उनसे क्षमा मांगने के लिए माथा टेका था, तभी आपके तिलक से एक चावल डिब्बी में गिर गया था और चीटिंयों को उनका भोजन मिल गया। सच है, पालनहार हर जीव का ध्यान रखते हैं। हमें भी अपना विश्वास बनाए रखना चाहिए।
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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