काशी सत्संग: सच्चा सत्कर्म

एक बार महाराज युधिष्ठिर ने राजसूर्य यज्ञ किया, तो उनके मन में अभिमान आ गया कि मैंने दान-पुण्य करते हुए जैसा यज्ञ किया है, ऐसा अन्य किसी ने नहीं किया होगा। युधिष्ठिर का अभिमान देखकर भगवान श्रीकृष्ण ने सोचा कि इस तरह अभिमान करने से तो किया गया पुण्य नष्ट हो जाएगा, इसलिए युधिष्ठिर का अभिमान तोड़कर उनके द्वारा किए गए पुण्य को नष्ट होने से बचाना चाहिए। श्रीकृष्ण ने अपनी माया से वहां एक नेवला प्रकट किया, जिसके आधे शरीर के बाल स्वर्ण के थे। नेवला यज्ञ के पात्रों में अपना मुंह डालता हुआ इधर-उधर दौड़ लगा रहा था। यह देखकर युधिष्ठिर चकित होते हुए बोले भगवान मैंने आज तक ऐसा विचित्र नेवला पहले कभी नहीं देखा। युधिष्ठिर की बात सुनकर श्रीकृष्ण ने कहा कि इस नेवले की कथा भी बड़ी विचित्र है। बहुत साल पहले यहां एक तपस्वी ब्राह्मण रहते थे। उनकी पत्नी, पुत्र और पुत्रवधू भगवान का भजन करते और धार्मिक परंपराओं के आधार पर अपना जीवनयापन करके खुश थे। ब्राह्मण की खास बात यह थी कि उनके दर पर कोई भी आता वह उसे विमुख नहीं जाने देते थे।
एक बार कई दिनों के उपवास के बाद उन्होंने भोजन बनाया। वे अपने परिवार के साथ जब भोजन करने बैठे, तभी एक दुर्बल व्यक्ति उनके द्वार पर आ गया और भोजन की प्रार्थना की। अतिथि को द्वार पर भूखा खड़े देखकर ब्राह्मण ने अपना भोजन उसे दे दिया। भोजन खाने के बाद ब्राह्मण ने पूछा तो अतिथि ने थोड़ा और भोजन मांगा। अतिथि के वाक्य सुनकर ब्राह्मण की पत्नी ने सोचा कि जिस स्त्री के सम्मुख उसका पति और अतिथि दो देव तुल्य प्राणी भूखे हैं, उसका भोजन करना धिक्कार है। ब्राह्मण की पत्नी ने भी अपना भोजन अतिथि को दे दिया।
ब्राह्मण की पत्नी के हिस्से का भोजन करने पर उस व्यक्ति की भूख नहीं मिटी और उसने और भोजन मांगा। इस प्रकार ब्राह्मण के पुत्र और फिर पुत्रवधु ने भी अपना भोजन अतिथि को खिला दिया। ब्राह्मण की पुत्रवधू द्वारा दिए गए भोजन को खाते ही वह अतिथि असल चतुर्भुज के रूप में प्रकट हो गया और उनको आशीर्वाद दिया।
साक्षात भगवान विष्णु को अपने सम्मुख देखकर ब्राह्मण परिवार की खुशी का तो ठिकाना ही नहीं था और वे सभी भगवान की स्तुति करने लगे। इस दौरान यह नेवला वहां पहुंचा और उस धर्मात्मा ब्राह्मण के दान किए हुए आहार की झूठन को खाया। उसी पल नेवले का आधा शरीर स्वर्ण का हो गया।
भगवान बोले अब तुमने राजसूर्य यज्ञ किया, तो नेवले ने सोचा कि क्यों न राजा युधिष्ठिर के यज्ञ में चलकर भोजन खाया जाए, जिससे उसका पूरा शरीर सोने का हो जाएगा और वह जीवों में श्रेष्ठ बन जाएगा। युधिष्ठिर इसी आशा में यह नेवला तुम्हारे यहां अतिथि ब्राह्मणों की झूठन खाता फिर रहा है।
भगवान युधिष्ठिर से बोले लेकिन दुख का विषय यह है कि आपके यज्ञ में इसके शरीर का एक भी बाल स्वर्ण का ना हो सका। इससे पता चलता है कि उस तपस्वी ब्राह्मण के किए हुए पुण्य के सामने आपका दान कुछ भी नहीं है। भगवान कृष्ण के मुख से यह बात सुनकर राजा युधिष्ठिर का अभिमान चकनाचूर हो गया। साथ ही उन्हें अपने अभिमान पर ग्लानि भी हुई।
मित्रों, अभिमान मनुष्य द्वारा किए बड़े से बड़े दान-पुण्य को नष्ट कर देता है, जबकि सच्चे मन से किया गया छोटा से छोटा दान भगवान के दर्शन कराता है।
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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