काशी सत्संग : बुराई का अंत

एक बाज एक सांप को अपने पंजे में दबाए आसमान की ओर उड़ रहा था। सांप अचानक पंजे से छूट गया और कुंए में जा गिरा। बाज ने उसे निकालने की बहुत कोशिश की आखिर थक कर वहां से चला गया। सांप की नजर तभी कुंए में मौजूद बड़े-बड़े मेंढकों पर पड़ी। सांप एक सूखे चबूतरे पर जा बैठा और मेंढकों के प्रधान को बुलाया और कहा- “मेरे जहर से तुम सब पानी में मारे जाओगे। इससे बचना चाहते हो, तो प्रतिदिन तुम एक मेढ़क मेरे पास भेजा करो, वह मेरी सेवा करेगा और तुम सब बहुत आराम से रह सकते हो…” इस तरह एक-एक कर सांप सारे मेढ़कों को खा गया। अब अकेले प्रधान मेढ़क बचा, तब सांप ने उससे कहा- “अब तुम्हारी बारी है।” प्रधान मेंढ़क ने कहा- “तुमने मेरे साथ विश्वासघात किया! सांप ने उत्तर दिया, “जो अपनों के साथ विश्वास घात करता है, उसका यही अंजाम होता है।” फिर उसने प्रधानको गटक लिया। कुछ देर के बाद सांप कुंए से बाहर आया और चबूतरे पर लेट गया। तभी अचानक वहां एक बाज आया और उसने झपट कर सांप को अपने पंजे में दबोच लिया। बाज ने सांप से कहा-” मैं वहीं बाज हूं, जिसके बच्चों को तूने पिछले साल खा लिया था और जब मैं तुझे पकड़ कर ले।जा रहा था, मेरे पंजे से छूट कर गिर गया था। मैं काफी समय से तुझ पर नजर बनाए हूं। अब सारे मेंढ़कों को खाकर तू बहुत मोटा हो गया है और मेरे बच्चे बड़े हो गए हैं, वे अब तुझे नोंच-नोंच के खाएंगे।” यह कहकर बाज सांप को लेकर उड़ गया। मित्रों, सार यह है कि बुराई चाहे कितनी भी ताकतवर हो, एक दिन उसका अंत हो जाता है।  ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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