काशी सत्संग : “अधर्म का दुष्परिणाम कब”

एक गांव में अगल-बगल में दो दुकान थे, एक परचून की और दूसरा हलवाई की। परचून की दुकान चलाने वाला ईमानदारी से धर्म पूर्वक सौदा बेचता था, जबकि हलवाई दूध में पानी मिलाकर बेईमानी और अधर्म पूर्वक कार्य करता था। थोड़े ही दिनों में हलवाई मालदार हो गया और परचुनी गरीब ही बना रहा।
दिन बीत रहे थे, तभी एक महात्मा गांव में पधारे। ईमानदार व्यक्ति ने महात्मा से प्रश्न किया, ‘ हे ज्ञानी पुरुष, मेरी शंका का निवारण करें। मैंने बड़े-बुजुर्गों से सुना है कि धर्मपूर्वक आचरण से ही व्यक्ति धनी होता है, फिर हलवाई अधर्म की राह पर चलकर धनी कैसे हो गया!’
महात्मा ने मुस्कुरा कर व्यक्ति की ओर देखा और बोले, ‘कुछ दिन मैं इसी गांव में व्यतीत करूंगा। तुम्हारे प्रश्न का उत्तर भी तलाशेंगे।’ ईमानदार व्यक्ति अब प्रतिदिन समय निकाल कर महात्माजी के पास इसी उम्मीद में जाता कि शायद उसके प्रश्न का उत्तर मिल जाए।
कुछ दिन यूं ही बीत गए। एक दिन वह जैसे ही महात्माजी के पास पहुंचा, वे बोले, ‘मेरे साथ गंगा स्नान को चलो।’ वहां पहुंचकर महात्मा ने गंगा किनारे उस व्यक्ति की ऊंचाई से गहरा गड्ढा तैयार कराया और परचुनी से उसके भीतर खड़े होने को कहा। उसके खड़े हो जाने के बाद महात्मा ने अपने कुछ सेवकों को उस गड्ढे में पानी भरने की आज्ञा दी। जब पानी ईमानदार व्यक्ति की गर्दन तक भर गया, तब उसने बड़े विनम्र स्वर में महात्मा से कहा, ‘अब यदि दो-चार घड़ा पानी और यहां डाला गया, तो मैं डूब कर मर जाऊंगा।’
महात्मा बोले, ‘गड्ढे में जब इतना पानी डालने पर तू नहीं मारा, तो दो-चार घड़े में कैसे मर जाएगा?’ व्यक्ति अभी उत्तर सोच ही रहा था कि महात्मा आगे बोले, गड्ढे में भरे इस पानी की ही तरह जब तक पाप मनुष्य के कंठ तक रहता है, तब तक पता नहीं चलता, जब आगे बढ़ता है और दम घुटने लगता है, तभी उसका दुष्परिणाम सामने आता है। वत्स, वैसे भी अधर्म से उपार्जित संपत्ति कभी भी सुख का कारण नहीं हो सकती, वह विपत्तियों को ही न्यौता देती है। साथ ही, अधर्मी सदैव मन से भयभीत भी रहता है, जबकि मनुष्य धर्मपूर्वक आचरण से सिर्फ रुपये-पैसे ही अर्जित नहीं करता, बल्कि इससे सम्मान रूपी सच्चा धन कमाता है। ईमानदारी से अपना काम करने वाले को ही असली सुख की प्राप्ति होती है और वह चैन की नींद सोता है।
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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