काशी सत्संग : मूर्ख को शिक्षा!

किसी पहाड़ पर बंदरों का एक झुंड रहता था। एक बार पहाड़ों पर काफी वर्षा और बर्फ पड़ने के कारण ठंड बहुत बढ़ गई। इस ठंड से बचने के लिए बंदरों ने एक ऐसे फल को आग समझकर इकठ्ठा कर लिया, जिसकी शक्ल आग से मिलती थी। इस आग को सुलगाने के लिए सभी बंदर फूंक मारने लगे, बाकी के बंदर उसे आग समझ चारों ओर तापने के लिए बैठ गए । इन बंदरों को देखकर एक पक्षी बोला- ‘अरे तुम सब पागल हो गए हो! यह अंगार नहीं यह तो उससे मिलता-जुलता फल है । इससे भला सर्दी कहां दूर होगी! तुम लोग किसी पहाड़ी गुफा में छुपने की बात सोचो, क्योंकि अभी तो बर्फ और गिरेगी ।’
बंदरों का सरदार बोला, “अरे तू हमें क्या बताएगा, हम सब समझते हैं ।’ पक्षी ने एक बार फिर कहा, ‘अरे भैया, मैं तुम्हारे ही हित की बात कह रहा हूं, तुम इस भयंकर ठंड से बचने के लिए कहीं पर भी छिप जाओ, नहीं तो मारे जाओगे ।’ उस पक्षी की बात सुनकर एक बंदर को क्रोध आ गया । उसने उस पक्षी के पर नोंचकर उसे पत्थर पर दे मारा । यह मिला उस बेचारे को भलाई और शिक्षा देने का फल। मित्रों, सच कहा गया है, “मूर्ख को शिक्षा देने का कोई लाभ नही होता।”
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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