काशी सत्संग : परमात्मा से बीमा

दो मित्र थे, बड़े परिश्रमी और मेहनती। अपने परिश्रम से दोनों एक दिन बड़े सेठ बन गए। दोनों ने बड़ा व्यवसाय खड़ा कर लिया। पहले सेठ ने अपनी सारी संपत्ति का बीमा करवा लिया। उसने अपने मित्र को बार-बार यही परामर्श दिया, परंतु दूसरे मित्र ने उसकी बात को अनसुना कर दिया। दुर्भाग्य से एक दिन शहर में आग लग गई। दोनों की सारी संपत्ति जल कर राख हो गई।
पहले सेठ ने बीमा करवा रखा था, इसलिए उसे सारी संपत्ति वापिस मिल गई, जबकि दूसरा मित्र निर्धन बन गया। अब पछताने के अतिरिक्त उसके पास कोई चारा नहीं बचा था।
मित्रों, मनुष्य का यह जन्म भी सेठ की संपत्ति के समान है। हम सभी को मालूम है कि एक दिन इस शरीर को भस्म होना है, मगर हम हैं की जीवन के इस अटल सत्य को जानकर भी अनसुना कर देते हैं। हम इसका कभी बीमा नहीं करवाते। न सत्कर्म करते है, न अभ्यास और वैराग्य द्वारा मोक्ष मार्ग को सिद्ध करते हैं, न योग मार्ग के पथिक बनते है, न ईश्वर का साक्षात्कार करते है। इसके विपरीत भोग, दुराचार, पाप, राग-द्वेष, ईर्ष्या, अभिमान, अहंकार, असत्य आदि के चक्कर में अपना बीमा ही करवाना भूल जाते हैं।
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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