काशी सत्संग : आत्मसंयम

यह कथा बंजारों की है। उन दिनों बंजारों का काम था खाने-पीने और जरूरत में आने वाली वस्तुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाना। एक दिन बंजारों ने कुछ युवाओं को 500 बैल गाड़ियों में सामान भरकर बेचने के लिए दूसरे शहर भेजा। बंजारों ने सामान लेकर निकलने से पहले युवकों को समझाया कि रास्ते में किसी अनजान व्यक्ति द्वारा दिया गया भोजन न करें, क्योंकि अक्सर लुटेरे विषाक्त भोजन देकर राहगीरों को लूट लेते हैं। बंजारों ने समझा-बुझाकर युवाओं को भेज तो दिया, लेकिन उन्हें युवाओं की चिंता हुई, सो पीछे से कुछ लोग उनकी देखरेख को चुपचाप भेज दिए।
युवकों की टोली जब वन मार्ग से गुजर रही थी, तो वहां रहने वाले गुंबिया नामक यक्ष ने उस मार्ग को भोज्य पदार्थों से सजा दिया। मना करने के बावजूद युवाओं ने उस अनजान और आकर्षक भोजन को खा लिया। इसके बाद वे एक-एक कर बेहोश होने लगे। तभी पीछे से आ रहे बंजारों ने उन्हें देख लिया और अन्य बंजारों को खबर कर दी। फिर बड़ी मुश्किल से उन्हें होश में लाया गया। जब सभी होश में आ गए, तब उनके सरदार ने कहा, ‘तुम्हारे छोटे से असंयम की वजह से आज तुम्हारी जान भी जा सकती थी। जीवन एक यात्रा है। यहां कई तरह के विषय-भोग हैं, जिनमें विष होता है। बुद्धिमान व्यक्ति महापुरुषों के अनुभव से लाभ उठाते हैं और स्वयं पर नियंत्रण रखते हुए शांतिपूर्ण तरीके से जीवनयापन करते हैं। जो व्यक्ति यह आत्मसंयम छोड़ देता है वह इस संसार में दुख भोगता है।’
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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