काशी सत्संग: संस्कार क्यों जरूरी

संत विनोबा भावे की माता का नाम रखुनाई और पिता का नाम नरहरि भावे था। नरहरि भावे हमेशा जरूरतमंद लोगों की सहायता करते थे। वे अमूमन एक या दो विद्यार्थी हमेशा अपने साथ रखते थे। उनके खान-पान का वो विशेष ध्यान रखते थे, यदि खाना बच जाता तो स्वयं वो खाना खाते, लेकिन उन बच्चों को ताजा खाना बनाकर खिलाते।
विनोबाजी यह सब देखते रहते। एक दिन उन्होंने अपनी मां से पूछा, ‘मां आप कहती हैं सभी में भगवान का वास रहता है, तो आप मुझे ठंडी और उन्हें गर्म रोटियां खाने के लिए क्यों देती हैं!’
मां ने कहा, ‘बेटा! मैं यह इसलिए करती हूं कि मेरा मोह अभी नहीं गया है विनोबा में मुझे मेरा बेटा दिखता है। और उन विद्यार्थियों में परमात्मा। जिस दिन तुम मुझे परमात्मा की तरह दिखाई देने लगोगे उस दिन मैं तुम्हें भी गर्म रोटियां खिलाउंगीं।’ माता-पिता के सात्विक विचारों से प्रभावित बालक विनोबा में भी सद्गुणों का विकास हुआ। और जीवन में आगे चलकर वे महान व्यक्ति बनें। सार यह है मित्रों कि बच्चों को सही दिशा और शिक्षा की शुरुआत घर से ही होती है।
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *