अब तो यह भी नहीं रहा अहसास

अब तो यह भी नहीं रहा अहसास,
दर्द होता है या नहीं होता।

इश्क जब तक न कर चुके रुस्वा*
आदमी काम का नहीं होता।

हाय क्या हो गया तबीयत को,
गम भी राहत-फजा* नहीं होता।

वो हमारे करीब होते हैं,
जब हमारा पता नहीं होता।

दिल को क्या-क्या सुकून होता है,
जब कोई आसरा नहीं होता।
■ जिगर मुरादाबादी
* रुस्वा–बदनाम
* राहत-फजा-आनंददायक

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

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