घुमक्कड़ साथी

यूं तो घुमक्कड़ी सागर रूपी विस्तृत संसार में विचरण के माध्यम से बार-बार गोते लगाकर जीवन की उथल-पुथल के बीच संतुष्टि के समान सीपियों के घुप्प अंधेरों में स्वयं के लिए बंद मोती तलाशने की एक कला हैं। अनुभवों के इन मोतियों की माला जब कभी पूर्ण हो जाती हैं, तो कोई महात्मा बुद्ध बन जाता है, तो कोई महावीर, कोई इन अनुभवों को कागज पर उतारकर राहुल सांकृत्यायन बन जाता है, तो कोई विश्व भ्रमण कर वास्को डिगामा और कोलम्बस। कुछ स्थल सदियों से महात्माओं और उनके अनुवाइयों के बार-बार भ्रमण करने से अत्यंत पवित्र और विशेष माने जाते हैं, जिनका भ्रमण जितनी बार किया जाए कम हैं। ऐसे ही कुछ स्थलों के दर्शन को सुगम बनाने के लिए आज आप का ये घुमक्कड़ साथी आपको इन स्थलों के विषय में बताएगा –

सारनाथ

Sarnath

पूर्व नाम ऋषिपत्तन, एक अत्यंत पावन स्थल हैं जो सदियों से ऋषि-मुनियों के आरण्य के रूप में जाना जाता हैं। कई किवदंतियों भी प्रचलित हैं, इस स्थल के बारे में जिनमें से कई भगवान् शिव, महात्मा बुद्ध, श्रेयांश नाथ से भी जुड़ी हैं। प्रचलित रूप में यह भगवान् बुद्ध की प्रथम उपदेश स्थली के रूप में विख्यात है। ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् बुद्ध ने कोसों का सफर तय कर सारनाथ में पांच शिष्यों को अपना प्रथम उपदेश दिया था। इतिहास में यह घटना ‘धर्म-चक्र परिवर्तन’ के नाम से प्रसिद्द हैं। बाद में अशोक ने बुद्ध की अस्थियों पर यहां कई स्तूपों और बौद्ध भिक्षुओं को रहने के लिए बिहार का निर्माण करवाया। वाराणसी के उत्तर में लगभग 15 किमी दूरी पर स्थित यह स्थल बौद्ध धर्मावलम्भियों के लिए आज भी चार मुख्य स्थलों में से एक हैं। बौद्ध धर्म को मानने वाले कई देशों ने बुद्ध के प्रति अपनी श्रद्धा के रूप में यहां अपनी शैली में कई भव्य मंदिरों का भी निर्माण करवाया है, जिससे वर्ष पर्यन्त यहां धार्मिक क्रियाकलापों और आयोजनों की सरित गंगा बहती रहती हैं। यह स्थल इतिहास, धर्म, संस्कृति, ज्ञान, और विरासत में रूचि रखने वाले लगभग सभी सैलानियों के लिए समान रूप से आकर्षक हैं।

सारनाथ के मुख्य आकर्षण :- मूलगंध कुटी विहार, धम्मेक स्तूप, धर्मराजिका स्तूप, चौखंडी स्तूप, पुरातात्विक पुरावशेष, संग्रहालय, प्रथम उपदेश स्थली, विभिन्न देशों के मंदिर, डियर पार्क, साउंड एंड लाइट शो, और सारंगनाथ मंदिर।

बोद्धगया 

Bodhgaya

बिहार के गया जिले में फल्गु (निरंजना) नदी के पश्चिमी किनारे पर स्थित यह स्थल सही मायने में विश्व में सत्य और अहिंसा के ज्ञान के प्रतिमान के रूप में सदियों से पल्लवित हो रहा है। महात्मा बुद्ध को यही पर पीपल वृक्ष (बोधि वृक्ष) के नीचे 49 दिनों की कठिन साधना के पश्चात् 35 वर्ष की अवस्था में ज्ञान प्राप्त हुआ था। आज भी यह स्थल उसी श्रद्धा और भक्तिभाव से प्रतिदिन बुद्ध के उपदेशों को दोहराता है। कहते हैं ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् बुद्ध ने सात सप्ताह तक यहां सात जगहों पर अविचल मुद्रा में व्यतीत किया। महाबोधि मंदिर प्रांगण में स्थित यह सात स्थल अत्यंत पवित्र माने गए हैं। बुद्ध के परिनिर्वाण के कई वर्षों के पश्चात् अशोक ने यहां एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया, जिसे बाद के राजाओं ने भी सुसज्जित करना जारी रखा। वर्त्तमान में म्यांमार के सहयोग से संरक्षित यह महाबोधि मंदिर विश्व धरोहर की सूची में शुमार हैं।

बौद्धगया के मुख्य आकर्षण :- महाबोधि मंदिर प्रांगण, बोधि वृक्ष, मुचलिंद झील, विभिन्न देशों के बौद्ध मंदिर, विशाल बुद्धाकृति, संग्रहालय, सुजाता गांव, और डुंगेश्वरी गुफा।

कुशीनगर

Kushinagar

उत्तर प्रदेश राज्य के उत्तर-पूर्व में स्थित यह जिला प्राचीन काल से ही प्रसिद्ध रहा है। माना जाता हैं त्रेता युग में यह भगवान् राम के पुत्र कुश की राजधानी हुआ करता था, और इसका नाम था कुशावती। छठी शताब्दी ईसा पूर्व में महाजनपद काल में यह मल्ल राजाओं की राजधानी हुआ करता था। वर्त्तमान में यह स्थल महात्मा बुद्ध के परिनिर्वाण स्थल के रूप में प्रसिद्द हैं। कहते हैं अपने अंतिम समय में महात्मा बुद्ध वैशाली और केसरिया के रास्ते यहां पहुंचे और अपना अंतिम उपदेश देने के पश्चात यही पर उन्होंने शरीर त्यागा और परिनिर्वाण को प्राप्त हुए। यही पर उत्खन्न में 6.10 मीटर लम्बी भगवान् बुद्ध की लेटी हुई प्रतिमा प्राप्त हुई थी, जो अभी महापरिनिर्वाण मंदिर में स्थापित हैं। यह कुशीनगर का प्रमुख आकर्षण स्थल हैं। बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर कुशीनगर में एक माह का मेला लगता हैं जिसमे लाखों की संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं।

कुशीनगर के मुख्य आकर्षण :- महापरिनिर्वाण मंदिर, महापरिनिर्वाण स्तूप, रामभर स्तूप, माथाकौर मंदिर, विभिन्न देशों के बौद्ध मंदिर, संग्रहालय।

लुम्बिनी

Lumbini

विश्व धरोहर सूची में सम्मलित यह स्थल नेपाल के दक्षिण में पहाड़ों की तलहटी में रूपनदेही जिले में स्थित हैं। पुरातात्विक अन्वेषणों के आधार पर इस जगह की पहचान महात्मा बुद्ध की जन्मस्थली के रूप में किया जाता हैं। यही पर 563 ईसा पूर्व में शाक्य कुल की रानी मायादेवी ने पुत्र रूप में महात्मा बुद्ध को जन्म दिया था। माना जाता हैं कि अशोक ने यहां पर बुद्ध की याद में कई बौद्ध विहारों का निर्माण करवाया था। इसकी पुष्टि चीनी यात्री फाह्यान और युवानच्वांग के यात्रा विवरणों से भी होती हैं। यहां पर हुए अनेकों उत्खननों में पौराणिक महत्त्व की मुर्तिया और पुरावशेष प्राप्त हुए हैं। यहां पर बुद्ध के पूर्व बसे एक समृद्ध गांव के भी प्रमाण मिले हैं जो स्थल की पौराणिकता को और पीछे ले जाते हैं। वर्त्तमान में यह मुख्य रूप से बौद्ध धर्मावलम्भियों की श्रद्धा स्थल के रूप में विख्यात हैं।

लुम्बिनी के मुख्य आकर्षण :- माया देवी मंदिर, विश्व शांति स्तूप, विभिन्न देशों के बौद्ध मंदिर, अशोक स्तम्भ, संग्रहालय।

इन सभी स्थलों की यात्रा आप वाराणसी या बौद्धगया को केंद्र के रूप में रखकर कर सकते हैं। यह दोनों जगहें पर्याप्त रूप में वायु और स्थल मार्ग से भारत के प्रत्येक शहर से जुड़े हैं। वाराणसी या बौद्धगया से इन सभी स्थलों के भ्रमण के लिए पर्याप्त साधन मौजूद हैं।

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Post Author: Sid

Lecturer by profession, entrepreneur by head but writer by heart. Likes to play and loves to travel. Nature lover and writer of perpetuity. Aficionado of Rudyard Kipling poetry and fiction

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