चुनावी चाय, बनारसी चर्चा

तमाम राजनीतिक उपद्रव के बाद आखिर पांच राज्यों की जनता ने नए जनार्दन तय कर दिए और भविष्य की आशंका, अनुमान को भी हवा दे दी। सत्ता की जुगाली करने का आदी अपना बनारस भी इससे कहां अछूता है, इलेक्शन चाहे कहीं हो चर्चा तो बनारसियों की जागीर है। इसी उम्मीद से यह अनपढ़ भी निकला बनारसी गली-मुहल्लों की खाक खंगालने, चंद कदम खिसके होंगे कि मुंह में पान घुली आवाज ने ठिठकाया- “का हो किशन..! मालिक, कहां हउआ.. इंहा सरकार पलट गइल.?” महादेव गुरु.. मिश्रित अभिवादन के साथ मेरे मुंह से निकला, “बस माहौल देखे निकलल रहली, तू भेटा गइला”।

फिर, क्या था। ठेठ बनारसी माटी से सनापुता जुमला, “चला गुरु चलल जाय, गदौलिया पे बैइठकी लगी, ओहि ठीयन चाय लड़ावल जाई।” हतबुद्धि सा हामी भरा और दोनों चल पड़े। गोदौलिया से आगे चौक की तरफ एक गली के नुक्कड़ पर चाय वाले के यहां दो सज्जन पहले से इंतजार कर रहे थे। आपसी कुशल-मंगल पूछ चाय मंगाई और चुनावी रिजल्ट पर चर्चा छिड़ गई। बाऊ साहब बोले, “ई जउन घोड़ागिरी चलत रहल, ओकर नतीजा त ई होने रहल। केहू कुछ करे या न करे बोले आवे चाही।” जवाबी कार्रवाई में गमछा गुरु उबल पड़े, “तब त तोहईं मोदी-मोदी चिल्लात रहला, इहो नाही सोचला कि कुछ गलत होत होई। अब झेला, पपुआ त रगड़ देलेस। अब का भिनभिनात हउआ।” तभी कहीं से पसीना पोंछते और किसी को गरियाते मुसटी गुरु आ धमके, मुझे थोड़ी चुहल सूझी और छेड़ा- “का पंडीजी.. कुर्सी छिनइते गरमा गइला।” पहले से उबल रहे मुसटी गुरु खुद पर काबू करते गंभीरता से बोले, “देखा यार! किशन गुरु, दिमाग मत खराब करा। पहिलहीं से एक मिला खराब नल लगाके कहत हव कि जा.. मोदीजी से हमार सिकायत कर दिहा।”
सभी मुस्कुरा दिए, फिर बाऊ साहब बात संभालते हुए बोले, “भाई उपाध्यायजी, गुस्सा थूंक दीजिए। हम सभी ने ‘हर-हर मोदी, घर-घर मोदी’ के नारे लगाए थे। अब कुछ सालों में बनारस बदले, न बदले देश की राजनीति बदल गई। अब लोग तो ताने मारेंगे ही, सहना सीखिए।” माहौल थोड़ा हल्का हुआ, तो मैं मुद्दे पर लौटा- “असल में बीजेपी का नुकसान कांग्रेस ने नहीं किया, बल्कि भाजपाइयों का दंभ उन्हें ले डूबा!!” इस पर गमछा गुरु बोले, “नहीं गुरु, जनता ने सत्ता पक्ष को धीरे से छुआया है। नोटबन्दी से काला धन ला रहे थे, जीएसटी से करचोरी रोक रहे थे, आरक्षण से निचलों को उठा रहे थे, गोहत्या से धर्मरक्षा कर रहे थे, राफेल डील से देशरक्षा कर रहे थे.. आदि कई फैक्टर मिले हैं।” मुसटी गुरु का गुस्सा भी राजनीतिक कुशाग्रता में तब्दील हो गया और उन्होंने ज्ञान उड़ेला- “मित्र! ये भी बताइए कि रामलला को घर तो मिला नहीं उनके दूत हनुमानजी की जाति घोषित हो गई, किसानों का कर्ज हवा में माफ हुआ, मॉबलिंचिंग से किसी को भी बेइज्जत कर दिया गया। यूपी इलेक्शन से पहले मुजफ्फरनगर, तो ताजा चुनावों से पहले बुलन्दशहर..!! अब गोहत्या को ही ले लीजिए.. हर जगह बंद है, गायों की कीमत गिर गई, दूध न देने वाली गोमाता का घर निकाला हो गया। गांवों में लावारिस गायें बढ़ीं तो खेतों को नुकसान पहुंचने लगा और गोमाता इस गांव से उस गांव भगाई जाने लगीं। क्या इस फैसले से पहले गोशालाओं की तैयारी जरूरी नहीं थी, ताकि पशुधन समृद्ध हो।” मामला धार्मिक होता देख मैंने टोका, “खैर, जीवहत्या तो गलत है, चाहे वह गाय हो या कुछ और.. हमें कानून पर नहीं मौजूदा जीत-हार पर चर्चा करनी चाहिए, अब आम चुनाव किस ओर जाएगा..?”
सभी एकसाथ बोले अभी कुछ महीने बाद की बात है, तब तक बहुत कुछ बदलेगा। अभी तो उर्जित पटेल का इस्तीफा, कांग्रेस की विधवा, पप्पू, फेंकू, चाणक्य, जेबलूटली, बहनजी-भाई-भतीजे जी, ठाकरेजी-पवारजी, ममताजी, ओवैसीजी, ईस्ट-वेस्ट-नॉर्थ-साउथ सब मिलकर तमाम गुल खिलाएंगे। तब जाकर बीमार जनता चुनावी खिचड़ी में पकेगी और जो कुछ देगी, वह राजनीतिक तरक्की की नई इबारत लिखने के काम आएगी। इसी के साथ दूसरे दौर की चाय खत्म कर सब विदा हुए। मेरे अनपढ़ मन में यही कुलबुलाता रहा कि हम एक नागरिक के तौर पर कितने भोले हैं कि नेताओं के जंजाल में फंस जाते हैं। सच तो ये है कि..
कौम-दर-कौम करती रहीं इक-दूसरे से नफरत।
जहर-दर-जहर भरते रहे के न बढ़ पाए रहमत।।
इक घर ऐसा दे दे मौला जो सर्वधर्म में रम जाए।
मुख में राम बगल में छुरी ये बातें अब थम जाएं।।

कृष्णस्वरूप

Post Author: kashipatrika

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