काशी सत्संग : कल्पना के लड्डू

किसी गांव में एक पंडित रहता था। उसने दान के आटे से धीरे-धीरे एक बड़ा मटका भरकर अपने पास रख लिया। प्रतिदिन सुबह उठकर पंडित मटके की ओर देखता और सोचता, यदि कभी अकाल पड़ जाए, तो इससे थोडा धन कमाया जा सकता है। इस आटे के पैसे से मैं दो बकरियां खरीदूंगा। जब बकरियों […]

काशी सत्संग : दान से समृद्धि

एक भिखारी प्रतिदिन की तरह एक सुबह भिक्षा मांगने निकला। वह राजपथ पर बढ़ा जा रहा था। एक घर से उसे कुछ अनाज मिला। वह आगे बढ़ा और मुख्य मार्ग पर आ गया। अचानक उसने देखा कि नगर का राजा रथ पर सवार होकर उस ओर आ रहा है। वह सवारी देखने के लिए खड़ा […]

काशी सत्संग : सत्य और लक्ष्मी

एक दिन राजा सत्यदेव अपने महल के दरवाजे पर बैठे थे, तभी एक स्त्री उनके सामने से गुजरी । राजा ने पूछा, “देवी!आप कौन है और इस समय कहां जा रही हैं?”स्त्री ने उत्तर दिया, “मैं लक्ष्मी हूं और यहां से जा रही हूं।” राजा ने कहा , “ठीक है, शौक से जाइए ।”कुछ देर […]

काशी सत्संग : सफलता का फॉर्मूला!

एक बार एक सिद्ध पुरुष एक छात्र के घर पहुंचे। परीक्षा का समय निकट था, पर उसने साल भर कुछ खास पढ़ाई नहीं की थी । गुरुजी को देखकर उसने सोचा कि ये सिद्ध पुरुष आवश्य कोई बता दें! वह समय निकालकर गुरुजी के पास आया और बोला – मुझे किसी काम में सफलता नहीं […]

नए वर्ष की शुभ कामनाएँ

हरिवंशराय बच्चन (वृद्धों को)रह स्वस्थ आप सौ शरदों को जीते जाएँ,आशीष और उत्साह आपसे हम पाएँ। (प्रौढ़ों को)यह निर्मल जल की, कमल, किरन की रुत है।जो भोग सके, इसमें आनन्द बहुत है। (युवकों को)यह शीत, प्रीति का वक्त, मुबारक तुमको,हो गर्म नसों में रक्त मुबारक तुमको। (नवयुवकों को)तुमने जीवन के जो सुख स्वप्न बनाए,इस वरद […]

काशी सत्संग: डायरी के पन्ने

यह उस समय की बात है, जब डॉ.राजेन्द्र प्रसाद देश के राष्ट्रपति बन चुके थे। राजेन्द्र बाबू को डायरी लिखने की आदत थी। एक बार अपने जन्मदिन पर सवेरे उठते ही जब वे अपनी डायरी में कुछ लिखने बैठे, तो उन्होंने देखा कि उसके कुछ पन्ने फटे हुए है। उन्हें समझते देर न लगी कि […]

काशी सत्संग : समय अनमोल

एक छात्र उच्च शिक्षा के लिए परदेश गया। उसका छात्रावास महाविद्यालय से थोड़ी ही दूर था। विद्यालय का समय प्रातः 8 बजे का था। पहले दिन जब वह छात्र अपने कमरे में तैयार हो रहा था, तभी आठ बज गए। फिर भी, वह आराम से चलता हुआ विद्यालय पहुंचा। वहां उसने देखा कि सब छात्र […]

काशी सत्संग : विनय

एक चांडाल की पत्नी को गर्भावस्था के दौरान एक दिन उसे आम खाने की इच्छा हुई, पर आम के फल का मौसम बीत चुका था। उसे जानकारी हुई कि राजा के बाग में बारह महीने आम आते रहते है, परंतु पहरेदारों के कारण लाने की परेशानी थी।चांडाल को दो विद्यायें आती थी। एक विद्या से […]

काशी सत्संग: अधिकार और कर्तव्य

चार चोर एक गाय चुराकर लाये। चोरों ने उसका बंटवारा इस प्रकार किया कि प्रत्येक चोर उसे बारी–बारी से एक-एक दिन अपने घर रखेंगे। चोर अपने आपको एक दूसरे से अधिक चतुर मानते थे। जिस दिन जिसकी बारी आती वह दूध तो निकाल लेता, मगर गाय को भोजन कोई नहीं देता, क्योंकि वह यह सोचते […]

काशी सत्संग: भूख गरीब-अमीर!

एक महात्माजी शाम के समय टहलने निकले, तो उन्होंने एक निर्धन को जंगल में देखा, जो इधर-उधर कुछ खोज रहा था। महात्माजी ने उससे पूछा, ‘बाबा क्या खोज रहे हो?’निर्धन बड़े ही करुण शब्दों में बोला-कुछ खाने योग्य फल-फूल मिल जाए, तो पेट की आग बुझ जाए।कुछ आगे जाने पर महात्माजी को एक सेठजी कुछ […]