काशी सत्संग : जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि

एक बार भगवान श्रीकृष्ण हस्तिनापुर की राज सभा में बैठे हुए थे। श्रीकृष्ण ने कौरवों के राजकुमार दुर्योधन को अपने पास बुलाया और एक कीमती हीरों की पोटली देकर कहा, ‘इस सभा में बैठे लोगों में तुम्हें जो श्रेष्ठ लगे, उनमें यह हीरे बांट दो।’दुर्योधन हीरे की पोटली लेकर सभा में घूमने लगा, फिर पोटली […]

काशी सत्संग : सबसे कीमती

एक राजा समय-समय पर प्रतियोगिताएं आयोजित करवाता और विजेता को सम्मान सहित पारितोषिक भी देता था। प्रजा इससे उत्साहित रहती थी। एक बार राजा ने राजपुरुष के चयन की प्रतियोगिता रखी। उसने एक वाटिका बनवाई, जिसमें हर तरह की वस्तुएं रखी गईं, किंतु उन पर उनका मूल्य नहीं लिखा गया था।राजा ने ऐलान किया कि […]

काशी सत्संग : अर्ध सत्य

एक नाविक तीन साल से एक जहाज पर काम कर रहा था। एक दिन नाविक रात में नशे में धुत हो गया। तीन साल में ऐसा पहली बार हुआ था। जहाज पर मौजूद कैप्टन ने इस घटना को रजिस्टर में इस तरह दर्ज किया, ‘नाविक आज रात नशे में धुत था।’नाविक की नजर जब रजिस्टर […]

काशी सत्संग : श्रीकृष्ण भारी या सोना!

भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी सत्यभामा के मन में एक दिन एक विचित्र विचार आया। उन्होंने तय किया कि वह भगवान श्रीकृष्ण को अपने गहनों से तौलेंगी। श्रीकृष्ण ने जब यह बात सुनी तो बस मुस्कुराए, बोले कुछ नहीं।सत्यभामा ने श्रीकृष्ण को तराजू के एक पलडे़ पर बिठा दिया और दूसरे पलड़े पर वह अपने गहने […]

काशी सत्संग: बिहारीजी की कृपा

गोवर्धन नाम का एक ग्वाला था। उसका कोई नहीं था, इसलिए बचपन से दूसरों पर आश्रित था। गोवेर्धन जिस गांव में रहता, वहां के लोगों की गायें चरा कर जो मिलता, उसी से अपना जीवन चलाता था। गांव के सभी लोग उससे बहुत प्यार करते थे।एक दिन गांव की एक महिला, जिसे वह काकी कहता […]

काशी सत्संग : परोपकार

एक बार एक कुछ ग्रामीण मिलकर एक सांप को मार रहे थे, तभी उसी रास्ते से संत एकनाथ गुजर रहे थे। भीड़ को देख संत एकनाथ भी वहां जा पहुंचे, बोले-भाइयों, इस प्राणी को क्यों मार रहे हो, कर्मवश यह सर्प हुआ है, लेकिन यह भी जीव है।संत की बात सुनकर भीड़ में खड़े एक […]

काशी सत्संग : हरि प्रिय

पांडवों का जीवन कठिनाई से भरा रहा, पर उन्होंने कभी इसकी शिकायत श्रीकृष्ण से नहीं की, जो उनके परम स्नेही थे, निकट के संबंधी थे और उस पर पांडव ये भी जानते थे की श्रीकृष्ण परम् भगवान हैं। पांडवो को श्रीकृष्ण के प्रति अगाध श्रद्धा थी। उन्होंने हर स्थिति में कृष्ण पर अपना विश्वास बनाए […]

काशी सत्संग : अंधेर नगरी

एक बार एक हंस और हंसिनी सुरम्य वातावरण से भटकते हुए उजड़े, वीरान और रेगिस्तान के इलाके में पहुंच गए। भटकते-भटकते शाम हो गई, तो हंस ने हंसिनी से कहा कि किसी तरह आज की रात यहीं बिता लो, सुबह हम लोग वापस अपने घर लौट चलेंगे! हंसिनी सहमत हो गई।रात हुई, तो जिस पेड़ […]

काशी सत्संग: ढोलक का राज

एक गांव में एक नाई रहता था। उसकी एक बुरी आदत थी कि उसके पेट में कोई बात पचती नहीं थी। अत: इधर की बातें उधर बताने का उसे शौक था। एक बार राजा का शाही नाई बीमार पड़ गया, तो राजा ने उस नाई को बुलवा भेजा। राजमहल जाकर नाई राजा के बाल काटने […]

काशी सत्संग : तप बड़ा या सत्संग!

एक बार गुरु वशिष्ठ और विश्वामित्र में बहस छिड़ गई कि सत्संग की महिमा बड़ी है या तप की महिमा। वशिष्ठजी का कहना था सत्संग की महिमा बड़ी है, जबकि विश्वामित्रजी का कहना था कि तप का महात्म बड़ा है।दोनों महर्षि में जब फैसला न हो सका, तो दोनों श्रीहरि भगवान विष्णु के पास पहुंचे […]