भोले भण्डारी- चतुर्थ पाठ

‘नाच न जाने आंगन टेढ़ा’

भारतीय जीवन में भाग्य का इतना महत्व है कि इसके बिना आम हिन्दुस्तानी के जीवन की परिकल्पना ही नहीं की जा सकती। मरना-जीना, सुख-दुख, लाभ-हानि, सोना-जागना सभी भाग्य भरोसे ही तो होता है। भारत की मूल अवधारणा के सबसे निकट किसान और उसकी खेती से इस भाग्य का तो चोली- दामन का साथ जोड़ दिया गया है। सच जानिए तो भारत में कृषि भाग्य भरोसे ही है। आदिकाल से इस भाग्य रूपी खेल की इतनी प्रतिस्पर्धा रही है कि सर्वज्ञ भारतीयों ने इसके महत्व पर अनगिनत टिप्पणियां लिखी हैं। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण राम मर्मज्ञ गोस्वामी तुलसीदास की टिका हैं, जिसमें वे कहते हैं “तुलसी भरोसे राम के, निर्भय हो के सोए- अनहोनी होनी नहीं, होनी हो सो होए।” अब जब स्वयं तुलसीदास ऐसा कहते हैं तो हम जैसे आम भारतीयों की बिसात ही क्या, जो यह कहे कि भाग्य भरोसे रहना केवल मन की एक दुर्बल अवस्था है।

मन की यही दुर्बल अवस्था व्यक्ति को कार्य से विमुक्त हो सोने को प्रेरित करते हैं। खेती-किसानी से विरक्त आधुनिक भारतियों जिनमें विदेशी ज्यादा और भारतीयता कम है, का यह सबसे प्रिय कार्य हैं। अब इतना तो मानना ही होगा कि तुलसीदास जी शहरी थे और सोने के बेहद शौकीन थे नहीं! तो वो राम भरोसे होकर काम करने को कहते जो भारत की मूल अवधारणा किसानी के समीप है।एक व्याख्या ये हो सकती है कि तुलसीदास जी खुद के अनुभव को एक ओर रखते हुए आम जन के मनोभाव को कह रहे हो। पर तुलसीदास जी ने अगर ऐसा किया होता तो अपना नाम इसमें बिल्कुल नहीं लिखते।

माना जाता है काम न करने और विलासिता में लिप्त रहने की आदत ही ने मध्यकाल में राजाओं का बंटाधार किया। मगर जैसा तुलसीदास ने कहा है “होइहि सोइ जो राम रचि राखा- को करि तर्क बढ़ावै साखा” इसके पीछे का भी मुख्य कारण भाग्य ही है।

विदेशी आक्रांताओं; जो भारत में आए उन्हें अक्सर इतिहासकार कर्मप्रधान मानते हैं। उनके कर्म ही थे कि वो मरुस्थल की खाक छान कर भारत पहुंचे। मगर भारत के भाग्य की परंपरा उन पर ऐसे पड़ी कि यहां उन्होंने कहना शुरू कर दिया “अल्ला मेहरबान तो गधा पहलवान।” अब भाग्य भरोसे अगर गधा पहलवान हो सकता है, तो कर्म करने की आवश्यकता ही क्यों हो!

देश में आज भी शहरी ज्ञान को महत्व दिया जा रहा है और लोकतंत्र के सत्तर सालों में ही स्थिति बद से बदत्तर हो गई है। सही माने तो, आम जन के भाग्य भरोसे रहने की इसी आदत के कारण आज भारत के शहर चूहेदान नजर आते हैं और गांव आज भी शहरी प्रकोप के कारण भाग्य भरोसे नजर आते हैं।

हालिया एक देसी मोहतरमा लिपस्टिक लागते हुए कह रही थी ‘इण्डिया इज सो डर्टी।’ मैंने कौतूहलवश पूछा, ‘वाई’? उन्होंने एक अजीब सा उत्तर दिया। ‘बिकॉज़ इंडियंस आर डर्टी’।

हां, मोहतरमा “इंडियन खिचड़ी इस रियली डर्टी, बट भारतीय फीलिंग्स आर येट नॉट इक्सप्रेसेड।”

■ सिद्धार्थ सिंह

Post Author: kashipatrika

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