बेबाक हस्तक्षेप

तारीखें बदलती हैं, किंतु कुछ वाक्ये वक्त की तख्ती पर अटक कर रह जाते हैं, जिनसे सदियों तक पीछा छुड़ाना मुश्किल हो जाता है। बोफोर्स, गोधरा, राम मंदिर… ऐसी कितनी ही तारीखें हैं, जो अब भी जस की तस बनी हुई हैं। ऐसी ही एक तारीख 8 नवंबर है।“नोटबंदी” की घोषणा की साथ अहम बनी इस तारीख को गुजरे दो साल हो गए, लेकिन इसे लेकर तर्क-कुतर्क-वितर्क का दौर अब भी जारी है। नोटबंदी का फैसला सही साबित करने में केंद्र सरकार जितनी कसरत कर रही है, काश! इसे लागू करने से पहले उतना ही होमवर्क किया गया होता।
बहरहाल, हिंदी समाचार पत्र ‛अमर उजाला’ में छपी ताजा रिपोर्ट से नोटबंदी एक बार फिर चर्चा में है। अखबार के मुताबिक नोटबंदी और महंगी पड़ने वाली है, क्योंकि उस दौरान छपे 2000 और 500 रुपए के नोट दो साल में ही चलने लायक नहीं रह गए हैं। इन्हें एटीएम में भी नहीं डाला जा सकता। दस रुपए के नए नोटों पर भी ऐसा ही खतरा मंडरा रहा है। इसका कारण नोटों में इस्तेमाल कागज की गुणवत्ता को बताया गया है। यह खबर सच हुई तो नए नोट छापने होंगे, जिस पर बड़ी रकम खर्च होगी। वित्त राज्यमंत्री पी राधाकृष्णन ने राज्यसभा में अपने लिखित जवाब में 8 दिसंबर 2017 को कहा था कि सरकार को 500 रुपए के नोट छापने में करीब 5,000 करोड़ रुपए का खर्च आया। वहीं, 2000 रुपए के नोट छापने में 1,293.6 करोड़ रुपए का खर्च आया। यानी केंद्र सरकार को नए नोटों के लिए फिर से करोड़ों स्वाहा करने पड़ेंगे।
हालांकि, सरकार नोटों की गुणवत्ता में चूक से इनकार कर रही है और उसका कहना है कि आम लोगों के इस्तेमाल के गलत तरीकों की वजह से नोट खराब हो रहे हैं।
वैसे, इस खबर की सच्चाई वक्त के साथ सामने आ जाएगी, लेकिन फिलहाल इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि केंद्र सरकार जहां नोटबंदी के सिर्फ फायदे गिनाने पर तुली है, वहीं विपक्ष और अर्थशास्त्रियों का बड़ा वर्ग नोटबंदी के नकारात्मक असर को रेखांकित करता रहा है। पिछले हफ्ते ही कृषि मंत्रालय ने भी अपनी रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया था कि नोटबंदी का किसानों पर बहुत ही बुरा असर पड़ा। हालांकि, अब मंत्रालय अपनी ही बात से मुकर रहा है। आरबीआई गवर्नर ने भी नोटबंदी के असर पर स्वीकारोक्ति की मुहर लगा कर सब कुछ सही न होने का इशारा तो दिया ही।
वैसे भी, नोटबंदी का विपरीत प्रभाव आर्थिक विकास से लेकर रोजी-रोजगार तक पड़ने के आंकड़े तो दिखते हैं, किंतु इससे लाभ की बातें तो सिर्फ बातें ही लगती हैं। पर, सच यह भी है कि आम जन यह कभी नहीँ जान पाएगा कि नोटबंदी फायदेमंद रहा, गलत निर्णय या सोची-समझी रणनीति के तहत कुछ लोगों के फायदे के लिए उठाया गया कदम? आम लोगों के लिए नोटबंदी भी एक रहस्य बनकर रह जाएगा और 8 नवंबर एक तारीख! जिसे लेकर समय-समय पर सियासी रोटियां सेंकी जाएंगी।
मैं जफर इकबाल साहब की शायरी के साथ अपनी बात खत्म करती हूं-
झूठ बोला है तो कायम भी रहो उस पर ‛जफर’
आदमी को साहब-ए-किरदार होना चाहिए।
■ सोनी सिंह

Post Author: Soni

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