बेबाक हस्तक्षेप

निदा फाजली ने लिखा है,
“मस्जिदें हैं नमाजियों के लिये,
अपने घर में कहीं खुदा रखना।”

बात तो उन्होंने बहुत गहरी कही है, लेकिन धर्म-आस्था जैसे-जैसे राजनीति का विषय बनता गया, मंदिर-मस्जिद के बाहर इबादत करने वालों की भीड़ बढ़ती गई और इंसानियत दम तोड़ती गई। नतीजतन, सबरीमाला हो या ‛श्रीराम’ बातचीत से हल निकलने के रास्ते बंद होते जा रहे है।खैर, फाजली साहब या उनकी तरह सोचने वालों की बातों से इत्तेफाक रखने वाले अब कम ही बचे हैं, सो अयोध्या में फिर भीड़ इकट्ठा हो रही है, जहां महिलाओं से न जाने की गुजारिश की जा रही है, उधर सबरीमाला में भी महिलाओं को आने से रोका जा रहा है, लेकिन यहां मामला पुलिस-उपद्रवी तामझाम में उलझा है।
बात चाहे जो हो, मगर इतना जरूर हुआ है कि ऐसी आस्था ने राजनीति को भी आस्तिक बना दिया है। परिणामस्वरूप, धर्मनिरपेक्षता-आपसी सौहार्द की बातें करने वाले भी हिंदू हो गए हैं और उदार भी। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम जिन्हें कभी धन-सत्ता के मोह ने नहीं घेरा और हमेशा प्रजा की भलाई चाही, उनकी प्रतिमा स्थापित की जा रही है, भले दिल में “प्रभु” के लिए जगह न हो! नारे लग रहे हैं, ‛हर हिंदू की यही पुकार, पहले मंदिर फिर सरकार’।

वैसे तो, प्रभु श्रीराम का सम्मान हर इंसान को करना चाहिए और उनके मंदिर से भी सबकी आस्था समान जुड़ी है, लेकिन इस आस्था के शोर तले देश में व्याप्त अन्य समस्याओं की अनदेखी नहीं हो रही! भूख सूचकांक की दृष्टि से हमारा देश दुनिया में 103 वें स्थान पर है यानी सबसे भूखे राष्ट्रों में गणना होती है हमारी। हमारा लैंगिक समानता स्थान 188 देशों में 125 वां है। मानव विकास सूचकांक की सूची में हम 130 वें नंबर पर हैं। प्रति व्यक्ति जीडीपी की दृष्टि से हमारी गणना दुनिया के सबसे निचले एक तिहाई देशों में होती है। क्या इन सवालों से देश या सियासत का कोई सरोकार नहीं है! और क्या ये भी सच नहीं कि भूखे भजन न होय गोपाला…

■ संपादकीय

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

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