बेबाक हस्तक्षेप

उत्तर भारत की फिजा में अब भी ठंड बनी हुई है, लेकिन माहौल में किसान आंदोलन की तपिश बरकरार है। कौन कितना सही, कौन कितना गलत से इतर बात करते हैं उस ‘लोक’ के आवाज की, जिस पर ‘तंत्र’ की नींव रखी गई है, तो पूरे घटनाक्रम पर एक सरसरी नजर दौड़ाएं जाने पर एक बात उभरकर सामने आती है कि भले ही पत्रकार, बुद्धिजीवी, विश्व की नामचीन हस्तियों को किसानों की बात में दम लगे, लेकिन केंद्र सरकार के लिए यह उतना मायने नहीं रखती! अब बात अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की करें, तो यह भी देश में कितना कायम है और किसके लिए है, विचारणीय बन जाता है! देश का प्रधान भले ही अपने ‘मन की बात’ सरेआम कह सकता है, लेकिन सिंघु बार्डर पर किसान आंदोलन कवर कर रहे पत्रकार मनदीप पुनिया को तिहाड़ के केंद्रीय कारागार संख्या 8 में कैद होना पड़ता है। हालांकि, एडिटर्स गिल्ड से लेकर तमाम संस्थाओं और पत्रकारों की जद्दोजहद के बाद पुनिया बाहर आ गए, परंतु क्या उनकी गिरफ्तारी सही थी! इतना ही नहीं, अभी भी 26 जनवरी को हुई हिंसा मामले में राजदीप सरदेसाई, मृणाल पांडे, जफर आगा सहित कई पत्रकारों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। खैर, आंकड़ों के हवाले से पिछले डेढ़ सालों में खबर लिखने के मामलों को लेकर करीब दर्जन भर पत्रकारों के विरुद्ध मुकदमे दर्ज किए गए हैं।
वहीं, पहले बिहार सरकार/पुलिस के बाद अब उत्तराखंड पुलिस ने भी विरोध-प्रदर्शन करने वालों के चरित्र को पुलिस वेरिफिकेशन रिपोर्ट में मेंशन करने का मन बना लिया है। सीधी तरह बात को समझें, तो हथियार के लिए लाइसेंस, पासपोर्ट, कैरेक्टर सर्टिफिकेट, कॉन्ट्रैक्ट वाली सरकारी नौकरी, सरकारी विभागों, आयोगों और बोर्डस में काम के कॉन्ट्रैक्ट, पेट्रोल पंप के लाइसेंस और गैस एजेंसी, सरकारी मदद, बैंक लोन सहित कुछ अन्य जगहों पर जहां पुलिस वेरिफिकेशन मायने रखता है, वहां ऐसे लोगों की एंट्री बंद हो सकती है। उत्तराखंड पुलिस ने तो बिहार से एक कदम आगे बढ़ाते हुए सिर्फ विरोध-प्रदर्शन करने वालों के ही नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर देश-विरोधी और असामाजिक पोस्ट्स डालने वालों का भी रिकॉर्ड तैयार करने को कमर कस ली है।
खैर, विरोध का तरीका वक्त के साथ बदल गया है और कई बार इसकी प्रासंगिकता भी कठघरे के घेरे में होती है, किंतु किसानों की मांग न धार्मिक हठ है, न ही असामाजिक लगती है। लोकतंत्र में सभी समान हैं और सभी को अपने ‘मन की बात’ एक जिम्मेदार तरीके से कहने की सहूलियत मिलनी चाहिए। यही लोकतंत्र की खूबसूरती भी है। वक्त के साथ यह कितनी बनी रहती है, आज के दौर में कहना मुश्किल जान पड़ता है।
फिलहाल, मेरे मन में काका हाथरसी की कुछ पंक्तियां स्मरण हो आईं, जिसके साथ ही मैं अपनी बात खत्म करती हूं…
जिसकी मुठ्ठी में सत्ता है, पारब्रह्म साकार वही है
प्रजा पिसे जिसके शासन में, प्रजातंत्र सरकार वही है

महंगाई से पीड़ित कर्मचारियों को करने दो क्रंदन
बड़े-बड़े भ्रष्टाचारी हैं, उनका करवाओ अभिनंदन

करें प्रदर्शन जो हड़ताली, उन पर लाठीचार्ज करा दो
लाठी से भी नहीं मरें तो, चूको मत, गोली चलवा दो…”

सोनी सिंह

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

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