बेबाक हस्तक्षेप

अदम गोंडवी की पंक्तियां बहुत कुछ कहती हैं, लेकिन समझ-समझ का फेर है, आप भी अपने-अपने हिसाब से उसका अर्थ या अनर्थ निकाल लें-

“काजू भुने पलेट में, विस्की गिलास में,
उतरा है रामराज विधायक निवास में।

पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत,
इतना असर है खादी के उजले लिबास में।”
अर्थ चाहे जो हो, लेकिन देश के वर्तमान राजनीतिक हालात इसी ओर इशारा कर रहे हैं कि चुनावी नैया पार लगाने की जद्दोजहद में जुटा हर राजनीतिक दल “धर्म” को भुनाना चाहता है। विकास, प्रयास, सड़क-पानी-रोजगार…इन बातों से जनता को भरमाना मुश्किल है, क्योंकि अब योजनाओं की जमीनी हकीकत के आंकड़ों को जुटाना मुश्किल काम नहीं रह गया है, फिर जिस हकीकत आम जन रोज दो-चार हो रहा है, उसे लेकर ठगना आसान भी नहीं है।

खैर, तो धर्म या आस्था एक ऐसा विषय बचता है, जिसकी रोजमर्रा की जरूरत से दूर-दूर तक वास्ता नहीं, मगर वह दिनचर्या का अहम हिस्सा है। फिर आस्था के सवाल पर गरीब-अमीर सबको आसानी से एक किया जा सकता है। सो, देश में सियासतदार एक बार फिर धर्म की डुगडुगी बजा रहे हैं। एक संप्रदाय आंदोलित है और दूसरा डरा हुआ सा रक्षा की पुकार कर रहा है। इन सबके बीच एक बार फिर आयोध्या में 25 नवंबर को ‛विशेष’ श्रद्धालुओं की भीड़ जुटने वाली है। कल क्या होगा, यह तो भविष्य के गर्व में है, आज सिर्फ अज्ञेय की पंक्तियां-

“रोज सवेरे मैं थोड़ा-सा अतीत में जी लेता हूँ-
क्यों कि रोज शाम को मैं थोड़ा-सा भविष्य में मर जाता हूँ।”

 

 

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

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