बेबाक हस्तक्षेप

“बस्ती में अपनी हिन्दू मुसलमाँ जो बस गए,
इंसाँ की शक्ल देखने को हम तरस गए।”

कैफी आजमी की लिखी ये पंक्तियां देश के वर्तमान हालात पर बहुत सटीक बैठती हैं। किसी पार्क में नमाज पढ़ने को लेकर उठाया गया कानूनी कदम राष्ट्रीय स्तर की खबर ही नहीं बना, बल्कि खबरिया चैनलों के माध्यम से हमारे घरों में प्रवेश कर चर्चा का विषय भी बन गया। कौन सही है? क्या गलत है? निर्णय लेने की हमारी क्षमता पर लगातार इस-उस धर्म-जाति-दल के प्रवक्ता-नेता यूं कब्जा कर रहे हैं कि आप थक-हार कर घुटने टेक दें। खैर, अगर आप मन में यह दोहराते रहें कि लोकसभा चुनाव करीब है, तो समझ पर अंकुश की कुछ गुंजाइश बचती है।
बहरहाल, नमाज पढ़ने की बात हो या शोर करते अन्य धार्मिक आयोजन क्या सचमुच आपको परेशान नहीं करते! घर के आसपास अचानक लगते टेंट, लाऊड स्पीकर को देखकर दिमाग में सवाल नहीं कुलबुलाते की ‛पता नहीं! कितने दिनों तक’ ये आयोजन चलेगा! घर में अगर स्कूल-कॉलेज जाने वाले बच्चे हों तो चिंता का पैमाना और ऊंचा होता है! तिस पर यह मजबूरी कि यदि आपने आयोजनकर्ता को टोक दिया, तब आपको या तो धर्म विशेष का विरोधी मान लिया जाएगा या तो नास्तिक की फेहरिस्त में ही न डाल दिया जाए! टोली बनाकर ढोल-बाजे के साथ धार्मिक आयोजन की परंपरा पुराने समय से चली आ रही है, लेकिन ध्यान दें, तो उन दिनों वाद्य यंत्र या तकनीक इतनी विकसित नहीं थी कि ये आवाजें इतना शोर उत्पन्न करें कि आपके कान के परदे फटने से महसूस हों।
फिलहाल, सच यह है कि इन आयोजनों से पहले आसपास किसी के घर कोई बीमार तो नहीं, बच्चों की परीक्षाएं तो नहीं…इस तरह के सवालों के जवाब कौन तलाशता है? और न ही इन्हें धर्म विशेष से जोड़कर देखा जा सकता है। फिर क्यों न धर्म-सम्प्रदाय के नाम पर डरने-डराने को सियासतदारों की मजबूरी बन कर ही रहने दिया जाए? इसे आमजन या मीडिया की मजबूरी न बनाएं, क्योंकि आमजन सिर्फ इंसान होता है, उसका न कोई धर्म, न ईमान होता है।
सोनी सिंह

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

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