बनारस की गलियां

खिलती है मेरे शहर में धूप,

छन के तंग गलियों से, लिपट के लहरों से…

 

सच पूछो तो शहर बनारस का अगर कोई दूसरा नाम होता जो इसके स्वरूप को ठीक-ठीक प्रदर्शित करता तो वो ‘गली-मोहल्ला’ ही होता। बनारस का जो रस है, उसका लगभग आधा हिस्सा तो इन्हीं गलियों-मुहल्लों से निकल कर आता है। विभिन्न स्थानों से बनारस आने वाले बड़े-बड़े सुरमा इन गलियों का लोहा मान चुके हैं। इनकी बनावट इतनी उम्दा और जीवंत है, जैसे मानो हर गली-मोहल्ला अपने आप में ही एक शहर हो। विश्वास नहीं होता कि 5 से 6 किमी में फैले गंगा के इस किनारे पर भारत के लगभग सभी राज्यों का नजारा देखा जा सकता है। इतना ही नहीं इनका खान-पान, बनावट, घर-आंगन, पहनावा, बोली और यहाँ तक की रहन-सहन भी अलग-अलग राज्यों के सामान है। अगर आप अपने राज्य से सीधे इन गलियों तक पहुंचे, तो सच पूछो तो आपको विश्वास ही नहीं होगा कि आप किसी दूसरे शहर में आ गए हैं। ये आपको अपने ही शहर की किसी गली की तरह दिखेगा।

 

कुछ खास गलियों के बारे में अगर पूछा जाए जिनसे बनारस का पुराना जुड़ाव रहा है, तो इनमे बंगाली टोला, बुलानाला, पंचगंगा घाट, और केदार घाट का क्षेत्र आता है। बंगाली टोला में जहां आप को ‘मिनी बंगाल’ के दर्शन होंगे, तो वहीं केदार घाट के क्षेत्र में आप तमिल और तेलगु संस्कृति की झलक पा सकते हैं। बुलानाला और चौखम्भा का क्षेत्र आप को रसूकदार व्यापारियों के दर्शन करवाता हैं जिनमें गुजरती प्रमुख हैं। ये क्षेत्र पंचगंगा घाट से लेकर गाय घाट के एरिया तक फैला हुआ है। सबसे मजेदार यह है कि अपने राज्य की पहचान बनाए रखने के साथ ही इन इलाकों के बसिंदों को आप बनारसीपन से अलग करके नहीं देख सकेंगे, क्योंकि ये सभी बनारसी संस्कृति में भी पूर्णतया रच-बस गए हैं।

 

त्योहारों के समय इन गलियों का नजारा देखने लायक होता है, जब ये गलिया-मोहल्ले साज-सज्जा से लेकर खान-पान तक अपने मूल शहर के रूप को प्रदर्शित करते हैं। सच है अगर आप किसी कारण वश बंगाल की दुर्गापूजा न देख पा रहे हों, तो आपको सीधे बनारस आ जाना चाहिए। यहाँ आपको उतना ही आनंद मिलेगा। गुजरात के गरबे का आयोजन जितनी भव्यता से बनारस करता हैं उतना शायद ही भारत का कोई दूसरा शहर कर पाता होगा। सही मायने में इन विभिन्न राज्यों के अनमोल मोतियों को एक माला में गूथने का कार्य बनारस ने जितने उम्दा तरीके से किया हैं, उतना कोई और शहर नहीं कर सकता।

■सिद्धार्थ सिंह

Post Author: Sid

Lecturer by profession, entrepreneur by head but writer by heart. Likes to play and loves to travel. Nature lover and writer of perpetuity. Aficionado of Rudyard Kipling poetry and fiction

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *