नहि कोउ अस जनमा जग माहीं…

चुनाव चाहे विधानसभा का हो, लोकसभा का या वार्ड जैसी छोटी इकाई का। बहुत सिरदर्द का काम है, खासकर खासमखास यानी वीवीआईपी-दुर्लभ जीवों के लिए। जिन्होंने पांच साल अपनी सुख-सुविधाओं की बढ़ोतरी पर ध्यान लगाया, चमचों के उत्थान पर गौर किया और सिर्फ सुखद स्वप्न लोक का विचरन किया, उन्हें अचानक पहाड़ खोद चुहिया निकालने सी मेहनत करने को कमर कसना पड़ता है। चेहरे पर पसीने के जितने छीटें चमकते हैं, सफलता की गारंटी भी उतनी ही बढ़ती लगती है। खास तो यह है कि पिछले कार्यकाल की समाप्ति के साल-छह महीने पहले से ही मेहनत की घड़ी टिक-टिक बजने लगती है। और सत्तारूढ़-विपक्ष अपने-अपने पक्ष में माहौल बनाने एवं दूसरे की कमियों पर पोथियां लिखने में जी-जान से जुट जाते हैं। कारण यह कि अपने पास बताने को कोई काम तो होता नहीं है! हो भी कैसे! अपने और अपनों की आशाओं को पूरा करने में ही साल दर साल कब सरक जाते हैं, होश ही नहीं रहता! इसी लिए अक्सर नेतागण ‛एक बार और हमारी सरकार’ की गुहार लगाते दिख जाते हैं। उस समय तो उनके चेहरे की मासूमियत भी चिल्ला-चिल्ला कर कह रही होती है कि ‛अबकी बार आपके लिए काम करेंगे, पिछली चूक माफ कर दो।’ पर करें क्या! जनता ने एक और मौका दिया, तो फिर से अपने सैकड़ों सपने कुलबुलाने लगते है और फिर…खास को आम दिखता कब है?
ताजा चुनाव परिणाम भी यहीं कह रहे हैं, “आपसे खुश नहीं, जनता पिछले ‛प्रभु की प्रभुता’ से निराश है।” अगर सत्तारूढ़ वापस आ गया, तो जान लीजिए वह ‛मैनेज’ बहुत बढ़िया करता है। जनता तक को मैनेज कर लिया! खैर, सच तो यह है प्रभुता पाकर आम जन की समस्याएं न किसी को दिखी है, न दिखेगी! मनुष्य में छुपे इस अवगुण को तुलसीदास ने  भांप लिया होगा! तभी उनकी लेखनी से यह बात निकली होगी-
नहि कोउ अस जनमा जग माहीं। प्रभुता पाई जाहि मद नाहीं।

■ सोनी सिंह 

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

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