#मी टू : “समरथ को नहीं दोष गुसाईं”

इन दिनों मी-टू (#Me Too) की चर्चाओं का बाजार गर्म है, नित नए खुलासे हो रहे हैं। हाल ही में नौ महिला पत्रकारों ने एक मंत्रीजी के चरित्र को कठघरे में खड़ा कर दिया। पिछले दिनों अमित शाह की रैली में आई महिलाओं के अंतर्वस्त्र तक खंगाले गए, ताकि कहीं कोई उन्हें काला झंडा न दिखा दे।
अब सत्ता पक्ष से जुड़े लोगों की बातों पर जाएं, तो ऐसा क्या हो गया, जो इतना हंगामा बरपा है!! इसमें इतना हो-हल्ला मचाने की क्या जरूरत है!? केंद्र सरकार के कंधों पर कई बड़ी जिम्मेदारियां हैं, “बेटियों को बचाकर, पढ़ाना है…” आखिर पढ़ेंगी, तभी तो उस कतार में शामिल होंगी, जहां एक पुरुष उनका शोषण करने को खड़ा होगा। खैर, इससे इतर बात सिर्फ इतनी ही है कि तुलसीदासजी ने बहुत पहले ही बड़ी अच्छी और सच्ची बात कही है, “समरथ को नहीँ दोष गुसाईं…।”
वैसे स्त्रियों के साथ व्यवहारिक-शारीरिक या मानसिक भेवभाव को देश-काल से जोड़कर देखना ठीक नहीं होगा, किंतु इसे समर्थता से जोड़ कर देखा जाना जरूरी है। अभी तक ‛#Me Too’ से जुड़ी खबरों-घटनाओं को पढ़कर तो ऐसा ही प्रतीत होता है कि असामान्यता की शुरुआत होती है सत्ता से। जब आपके पास किसी की जिंदगी बदलने, उसे जिंदगी बदलने का झांसा देने की ताकत होती है, वहीं से स्त्रियों-लड़कियों को स्त्री-पुरुष समाज में बांटकर देखने की समझ अचानक उत्पन्न हो जाती है। कई बार अचानक समझदार हुआ यह व्यक्ति-समुदाय कोई खास सत्ता-रुतबा नहीं रखता, बस पुरुष होने से भी यह ज्ञान उदित हो जाता है। बिहार में स्कूली छात्राओं के साथ छेड़छाड़ और फिर मनचलों द्वारा पिटाई भी कुछ ऐसा ही उदाहरण है।
खैर, अमित शाह की रैली से पहले महिलाओं के वस्त्रों को भद्दे तरीके से टोहना भी कुछ ऐसी ही सत्तागत दास्तान कहता है, जहां #Me Too की शिकायत दर्ज कराने वाला कोई नहीं है, क्योंकि “समरथ को नहीं…”। कहने-सुनने में वैसे भी क्या रखा है, क्योंकि इससे क्या और कहा तक बदलता है यह देखने-विचारने लायक है। वैसे भी, कई मामलों में देश के उच्च पदों पर विराजमान लोग आंख-कान बंद कर लेते हैं। फिर मंत्री अपनी ही पार्टी का हो तो, ‛समझ समझ कर न समझना भी एक समझ है।’
■ सोनी सिंह

Post Author: Soni

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