“आयुष्मान” भवः

“आयुष्मान भारत” की आयु लोकसभा चुनाव जितनी होना तो निश्चित ही है, क्योंकि उसके बाद इसकी आवश्यकता भी नहीं रहेगी! खैर उम्र से क्या लेना-देना यहां तो केंद्र की नेक नीयत की बात है, जिसके लिए “नोबेल” तक की चर्चा हो गई। सो पहले से ही कल्याणकारी योजनाओं में लाभ की डुबकी लगा रही जनता को केंद्र ने अब “आयुष्मान” करने का मन बना लिया है। आखिर दस करोड़ से ज्यादा परिवारों का सवाल था, तो भारत सरकार के ही इन आंकड़ों पर गौर करना जरूरी नहीं समझा गया कि देश में 11082 मरीजों के लिए एलोपेथी में औसतन सिर्फ एक डॉक्टर उपलब्ध हैं, 1844 मरीजों पर औसतन सिर्फ एक बेड और 55,591 लोगों के लिए औसतन एक सरकारी अस्पताल उपलब्ध है। इस ओर भी ध्यान देना जरूरी नहीं लगा होगा कि ‛आयुष्मान भारत योजना’ लागू होने के बाद मरीजों की संख्या 20 फीसदी बढ़ेगी, जिनके लिए डॉक्टर और अन्य स्टाफ कहा से आएंगे? इसके अलावा संघीय स्वास्थ्य सेवा और ऐसी ही जनवित्त पोषित स्वास्थ्य बीमा योजनाएं, जो एक दर्जन से अधिक राज्यों में साल 2007 के बाद से ही लागू हैं, उनका निराशाजनक रिकॉर्ड खंगालने का प्रयास भी किसी ने नहीं किया।अब ये बात और है कि कुछ लोगों को ऐसा लग रहा है कि ‛आयुष्मान’ को ‛मोदी केयर’ का जामा पहनाकर बीजेपी ने सबसे बड़ा चुनावी दाव चल दिया है, जिसमें करीब दस करोड़ परिवारों के करीब 50 करोड़ लोगों को योजना कार्ड थमाकर चुनावी लाभ उठा लेने का लक्ष्य है। जबकि, सरकार की मंशा तो लोगों का भला करने की है, तो उसने ‛आयुष्मान भारत’ के शुभारंभ के एक दिन बाद ही इससे अलग होने वाले पांच राज्यों तेलंगाना, ओडिशा, दिल्ली, केरल और पंजाब की सरकारों को ईष्यालु मान लिया।
जब सीएम तक को ईष्यालु मान लिया गया, फिर हम भला योजना में कमी देखने की गुस्ताखी कैसे करते! वैसे भी, “आयुष्मान भारत” जैसे बढ़िया नाम की योजना कागजों पर भी दर्ज रह कर जिंदा रहे तो क्या बुरा है! टीवी पर और अखबार के पन्नों पर योजना 2019 तक चमकती ही रहेगी, उसकी जमीनी हकीकत जानने की किसे पड़ी है? पुरानी योजना से कितनों को लाभ पहुंचा, उस पर कितना खर्च हुआ, उनकी जमीनी हकीकत भी तो झूठ की मोटी जिल्द लगा कर कागजों में दफ्न है ही न!
सच बताएं तो, हमारे कुढ़ने की वजह एक ताजा रिपोर्ट भी है, जिसमें लुढ़कते रुपए, तेल-रसोई गैस के बढ़े दाम के बीच यह सच सामने आया है कि देश के 831 लोगोँ के पास 1000 करोड़ रुपये से अधिक की सम्पत्ति है, जो भारत की कुल जीडीपी का एक चौथाई है। हमारी मध्यम वर्गीय मानसिकता पर चोट पहुंचती एक और खबर यह कि एक साल में अमीरों की इस सूची में 214 नए नामों ने जगह ही नहीं बनाई, बल्कि मुकेश अंबानी की सम्पति पिछले एक साल में हर रोज 300 करोड़ रुपये बढ़ी।
बहरहाल, कांग्रेस की रात-दिन “राफेल, राफेल, राफेल…” रट से लगता है कि हमारे कानों को भी जल्द ही इलाज की जरूरत पड़ सकती है। फिर इलाज एकदम मुफ्त और ‛कैशलेस’ हो जाए, तो हर्ज क्या है। पर न हमारी सैलरी दस हजार प्रतिमाह ही बढ़ती है, न हम गरीबों की श्रेणी में ही आते हैं, जो केंद्र सरकार का हृदय हमारे लिए भी पसीजे। हम उस मध्यम वर्ग में आते हैं, जो ‛आसमान से गिर कर खजूर पर आदि काल से जो लटका’ अब तक वहां से उतर नहीं पाया!

■ सोनी सिंह

Post Author: Soni

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