‘अमृत- वाणी’ – श्रेष्ठतम रचना इंसान है जो कर्मण्यता या अकर्मण्यता से सुख- दुःख पाता है..

एक मुहल्ले में कुत्तों की संख्या बहुत  हो गयी थी और इसका कारण था मुहल्ले में रहने वाले एक दयालु सज्जन। सज्जन बहुत कर्मठ भी थे और अपने मेहनत की कमाई को जानवरों पर बड़ी श्रद्धा से खर्च करते थे। कुत्तो को बड़े चाव से अंडे, बिस्कुट, ब्रेड दिया करते थे।
उसकी मुहल्ले में एक जन थे जिनको दूसरे के घर लगे पेड़ पौधों और उनसे गिरकर उनके आंगन और ओसारे तक़ आ जाने वाले पत्तो तक़ से दिक्कत होती थी। वह प्रायः ही अपने दीवार पर लटकते पत्तो को काटते रहते। पर ज़्यादा लोगों के घरों में हरियाली ही थी, लतर की, पौधों की, पेड़ो की; सज्जन के पास बस विशाल अहाते में गमले ही थे।
इसी मुहल्ले में ग़रीब के कुच्छ झोपडे भी थे और गरीब के पास प्रायः बच्चे भी कुच्छ एक ज़्यादा ही मिलते है, ये विरोधा भास भारत की तस्वीर है, कैसे और क्यों, यह विश्लेषण का गहरा विषय है। तो इन बच्चों से प्रायः मुहल्ले में सबको ही कोई ख़ास लगाव न होता। बच्चे थे तो थोड़े शरारती पर बच्चे और शरारत कहा तक़ अलग करके रखा जाए।
अब भगवान के बनाये सभी रचना में मानव जन्म श्रेष्ठ है फ़िर इन बच्चों को कुत्तो और पेड़ पौधों के रख रखाव से भी कम ध्यान वो भी मानव द्वारा ही?? इसको द्वार पर आए एक भगवान के सेवक ने ऐसे बताया, ‘ भगवान ने सबसे श्रेष्ठ चीज़ ही इंसान को दे दी और वह है विचार सकने की क्षमता। अब उसपर भी उसको दूसरों से मदद ही चाहिए अपने बच्चों के लिए। इसका कारण है उसकी अकर्मण्यता और दयनीय बने रहने की इच्छा। और इच्छा पूरी करना तो भगवान का काम है। भगवान इनकी इच्छा ही तो पूरी करते हैं। ‘
‘श्रम से संचित कर सके रुपया पैसा कोई, बैठे को कैसे मिले रोटी कपड़ा ठौर।’
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Post Author: Aditi

Loves to write and Paint. Cartoonist by heart and Content by nature

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