“आप भी प्रेम कर सकते हैं”

अमर प्रेमियों की तरह हर मनुष्य प्रेम क्यों नहीं कर सकता, क्योंकि लोगों का प्रेम जल्दी चूक जाता है। प्रेम की नदी बहने से पहले ही विदा हो जाती है और पीछे मरुस्थल रह जाता है...

​प्रेम तो बहुत लोगों ने किया है, लेकिन कभी फरहाद और मजनू को पढ़ लेना उपयोगी है। हमारा प्रेम जल्दी चूक जाता है। पता ही नहीं चलता कब चूक गया। ठीक से याद भी नहीं कर सकते कि कभी था। सब रूखा-सूखा रह जाता है भीतर। नदी आने के पहले ही विदा हो जाती है और मरुस्थल हो जाता है। लेकिन कुछ ऐसे भी लोग रहे हैं, जो कि जिंदगी भर प्रेम किए ही चले गए हैं। और इनके प्रेम का कोई हिसाब लगाना मुश्किल है। अगर इन प्रेम करने वालों से आप थोड़े परिचित हुए, तो अपने प्रेम को समझने में बड़ी सुविधा हो जाएगी और हो सकता है कि आपके भीतर भी कोई धारा अंतर्गर्भ में बहती हो और उसका स्मरण आ जाए। ऐसा नहीं कि आप मजनू हो जाएंगे। उसका कोई उपाय नहीं है। होना भी नहीं है। और क्या कोई मजनू हो सकता है! बाल वगैरह लटका लेगा मजनू की तरह, कपड़े-लत्ते पहन लेगा मजनू की तरह, सड़क पर गुजरने लगेगा, चिल्लाने लगेगा–लैला, लैला; नहीं, सब बेकार होगा। उसमें कोई मतलब नहीं होगा। उसके भीतर से तो कहीं कुछ आएगा नहीं।

लेकिन, आपका भी अपना प्रेम है, जो मजनू और फरहाद के प्रेम से शायद सजग हो जाए, सुलग जाए। शायद बारूद आग पकड़ जाए और आपको भी पता चले कि मैं भी ऐसे ही चूक जाने वाला नहीं हूं, मेरे भीतर भी कोई धारा है। उसी अर्थ में कह रहा हूं। बहुत लोगों ने गीत लिखे हैं, लेकिन कालिदास या रवींद्रनाथ का गीत पढ़कर आपको पहली दफा कुछ दिखाई पड़ना शुरू होता है, जो आपको शायद कभी दिखाई नहीं पड़ा था। वह आपकी भी संभावना थी। लेकिन प्रसुप्त थी।

■ ओशो

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

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